पंडित महावीर प्रसाद द्विवेदी

पंडित महावीर प्रसाद द्विवेदी (pandit mahaveer prasad dwivedi) जी का जन्म 9 मई,1864 को रायबरेली के दौलतपुर गांव में हुआ था! जो बिलकुल ग्रामीण क्षेत्र था! आर्थिक कठिनाइयों और उचित देख-रेख एवं मार्ग प्रदर्शन के अभाव में भी उन्होंने अपने बल पर जिस प्रकार अध्ययन और ज्ञान प्राप्त किया वह किसी आश्चर्य से कम नहीं कहा जा सकता! बिना ऊँची शिक्षा प्राप्त किये वह हिंदी के आचार्य के रूप में सम्मानित हुए,जो एक आश्चर्य-सा लगता है!

द्विवेदी जी (pandit mahaveer prasad dwivedi) 17 वर्ष की उम्र में ही उन्नाव की स्कूली शिक्षा छोड़कर अपने पिताजी पंडित रामसहाय दुबे जी के पास मुंबई चले गए! उनके पिताजी सेना की नौकरी छोड़कर एक सेठ के यहाँ काम करते थे! द्विवेदी जी में कर्मठता,संघर्ष और स्वाध्याय के प्रति बचपन से ही गहरा रुझान था! कम ही लोग जानते होंगे कि द्विवेदी जी का रेल विभाग से भी जुड़ाव रहा है! मुंबई में रहने के समय ही उन्हें 18 वर्ष की उम्र में ही जी.आई.पी. रेल में उन्हें 20 रु. मासिक की तारबाबू की नौकरी मिल गयी!

आगे द्विवेदी (pandit mahaveer prasad dwivedi) जी नौकरी करते हुए मुंबई,नागपुर,अजमेर होते हुए वापस मुंबई लौट आये! इसके बाद उन्होंने पांच वर्षों तक रेल विभाग के हरदा,खंडवा,होशंगाबाद,इटारसी,झाँसी नगरो के कार्यालयों में काम किया! इस दौरान उन्होंने न केवल तार के काम को योग्यतापूर्वक किया,तार के कार्य पर अंग्रेजी में एक पुस्तक भी लिखी!यही पर कट्टर स्वाभीमानी द्विवेदी जी ने अपने अधिकारों के व्यवहार से परेशान होकर अच्छे-खासे वेतन वाली नौकरी को छोड़ने में ज़रा भी देरी नहीं की! त्याग -पत्र देने के बाद वह इंडियन प्रेस के स्वामी बाबू चिन्तामणि घोष के प्रस्ताव पर केवल 23 रु. मासिक वेतन पर सरस्वती पत्रिका के संपादन-कार्य से जुड़े! आचार्य द्विवेदी जी ग्रामीण परिवेश में रहकर भी देश-विदेश के समाचार और सूचनाओं से सदैव समृद्ध या कहे तो अपटूडेट रहते थे! इसमें सहायक होता था उनका भाषाओं का ज्ञान और पुस्तके तथा पत्र-पत्रिकाएं! जब द्विवेदी जी झाँसी में रेल विभाग में कार्यरत थे तब श्री मैथिलीशरण गुप्त,बाबू वृंदावनलाल वर्मा जैसे साहित्यकार उनके संपर्क में आये!

बाबू वृंदावनलाल जी की पहली कहानी महावीर प्रसाद pandit mahaveer prasad dwivedi()जी की कृपा की वजह से ही छपी थी! आगे चलकर मैथिलीशरण गुप्त जी राष्ट्रकवि के रूप में तथा बाबू वृंदावनलाल वर्मा जी उपन्यास सम्राट के रूप में पहचाने गए! द्विवेदी जी 1903 से 1920 सरस्वती का संपादन करते रहे! सरस्वती इंडियन प्रेस में छपती थी! द्विवेदी जी रचनाओं का चयन संशोधन कर हमेशा समय से इलाहबाद स्थित प्रेस को भेज देते थे! इस तरह सरस्वती इलाहाबाद से प्रकाशित होकर हर महीने अपने समय पर दिल्ली-लाहौर तक पाठकों को मिल जाती थी! द्विवेदी जी की 70 वीं वर्षगांठ पर काशी नागरी प्रचारिणी ने 9 मई 1933 को एक भव्य आयोजन काशी में कराया!

उस अवसर पर द्विवेदी जी ने अपना लिखित भाषण पढ़ा! द्विवेदी (pandit mahaveer prasad dwivedi) जी ने सरस्वती पत्रिका के संपादक के रूप में 1903 से लेकर1920 की अवधि में एक आचार्य के रूप में एक अनुशासित रचनाकर्म का पाठ पढ़ाया! यहविडंबना ही कही जाएगी कि हिंदी वालों ने ऐसे आचार्य को भुला-सा दिया है!

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